सोनम कपूर ने दिया फिल्म को नया मोड़, पर्दे पर कुछ ऐसा दिखा पिता-बेटी का रिश्ता…

(प्रियंका सिन्हा झा)


‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ जैसी लीग से हटकर फिल्म के जरिए डेब्यू करने वालीं डायरेक्टर शैली चोपड़ा धर, विधु विनोद चोपड़ा और फॉक्स स्टूडियोज ने कमर्शियल सिनेमा की सूरत बदलने की कोशिश की है. समलैंगिक रिश्ते पर बात करती ये फिल्म फैमिली और पिता-बेटी के रिश्ते के मर्म को भी बखूबी दिखाती है.

‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ का नाम विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म ‘1942 ए लव स्टोरी’ के एक मशहूर गाने से लिया गया है. फिल्म में अनिल कपूर, सोनम कपूर, जूही चावला, राजकुमार राव, बिजेंद्र काला और सीमा पहवा जैसे लीडिंग स्टार्स हैं. ये फिल्म एक ऐसे सब्जेक्ट पर आधारित है, जिसके बारे में बात करने मुश्किल तो है, लेकिन समाज को इसकी बहुत जरुरत है.

प्लॉट की बात करें तो स्वीटी (सोनम कपूर), पंजाबी फैमिली की एक जवान लड़की है, जिसकी शादी करने के लिए पूरा परिवार उतावला है. खासकर उसका भाई बबलू.. जिसके चलते रिश्तों की लाइन लगी हुई है. इसी बीच स्वीटी की जिंदगी में रिश्ता लेकर आता है साहिल मिर्जा (राजकुमार राव), सिलसिला शुरू होता है कई कॉमेडी और रोमांस का, लेकिन ये फिल्म यहीं तक सीमित नहीं है..

फिल्म लव स्टोरी तो है, लेकिन जरा हटकर. पीजी वोड हाउस की कहानी ‘डेमसिल इन डिस्ट्रेस’ पर आधारित ये फिल्म शानदार कॉमेडी से भरी है. फिल्म में ट्विस्ट तब आता है, जब हमें पता चलता है कि स्वीटी को प्यार तो है ,लेकिन साहिल मिर्जा से नहीं बल्कि किसी औरत से…

LGBTQ द्वारा की जा रही पहचान की लड़ाई दो देखते हुए ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ रिलीज के लिए इससे बेहतर और कोई समय हो ही नहीं सकता है. हाल ही में केरल हाईकोर्ट ने धारा 377 के तहत एक लेस्बियन कपल को मिलवाया है. इस कपल को उनकी फैमिली ने समाज के डर से अलग कर दिया था. इसे भारतीय समाज में बदलाव का एक संकेत मान सकते हैं.

ये कहता उचित होगा कि समाज के लिए ये स्वीकार करना आसान हो न हो, लेकिन भारतीय सिनेमा में समलैंगिक रिश्तों पर बन रही फिल्में लोगों की राय बदलने की कोशिश जरूर कर रही हैं. चाहे वो ‘My Brother Nikhil and I Am’ हो या फिर करन जौहर और ‘बॉम्बे टॉकीज’ की शॉर्ट फिल्म. यहां तक कि ‘कपूर एंड संस’ जैसी फिल्मों के जरिए मेन स्ट्रीम एक्टर्स भी इस मुद्दे पर बात करने से कतरा नहीं रहे हैं.

लेस्बियन रिलेशनशिप पर आखिरी फिल्म 1998 में आई थी जिसका नाम था ‘फायर’, शबाना आजमी की इस फिल्म को जबरदस्त विरोध और बैन झेलना पड़ा था. वहीं, ऐसे में 21 साल बाद ये बदलती सोच का ही सबूत है कि समलैंगिक रिश्तों पर बनी ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ थियेटर्स में देखी जा रही है.

‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ की बात करें, तो फिल्म मेकर्स ने इसके व्यापक दर्शकों को ध्यान में रखते हुए इसे आर्ट फिल्म की बजाए कमर्शियल रखा है. इसके साथ ही फिल्म अपने कंटेंट पर काफी स्पष्ट भी है.

फिल्म की को-राइटर, गजल धालीवाल ने फिल्म को साधारण रखा है. जिसमें एक ऐसी स्वीटी की दुनिया दिखाई गई है, जो बेहद खूबसूरत तो है, लेकिन उसके अंदर काफी डर और असमंजस भी है.

धालीवाल की बात करें, तो उनकी निजी कहानी भी किसी फिल्म से कम नहीं है. उन्होंने लड़के के तौर पर जन्म लिया था, लेकिन बाद में सेक्स रीअसाइनमेंट सर्जरी के बाद उन्होंने खुद को खोजा है. बस वही हैं जो अस्तित्व की इस लड़ाई को बेहद खूबसूरती से स्क्रीन पर उकेर सकती हैं. स्वीटी और उसकी प्रेमिका कुहु (रेजिना कैसेंड्रा) के किरदारों को शानदार तरीके से गढ़ा गया है, जो ऑडिएंस को भटकाता नहीं है. मेन स्ट्रीम सिनेमा में ऐसा कम ही देखने को मिलता है.

फिल्म की लीड एक्ट्रेस सोनम कपूर खुद भी एक जानी-मानी नारीवादी हैं, उन्होंने ये बाद इस फिल्म को चुन कर साबित कर दी है. इसके लिए साथ आए हैं उनके पिता अनिल कपूर-पिता और बेटी के किरदारों को जिसकी खूबसूरती से इन दोनों ने निभाया है शायद ही कोई और निभा सके.

अनिल कपूर चार्मिंग और जानदार तो हैं हीं इसके साथ ही वे दुल्हन के पिता के किरदार में एक सहजता लेकर भी आते हैं. इसमें कोई शक नहीं कि वे फिल्म की लाइम लाइट ले जाते हैं. राजकुमार राव तो शानदार लगे हैं. वहीं बबलू के किरदार में अभिषेक दूहन भी अच्छे दिखे हैं. नई एक्ट्रेस रेजिना कैसेंड्रा ने छोटे से रोल से ही प्रॉमिसिंग डेब्यू किया है. सीमा पहवा की तरह ही जूही चावला भी अपने टॉप फॉर्म में हैं.

फिल्म की डायरेक्टर धर ने काफी जबरदस्त काम किया है. फिल्म की सबसे शानदार बात ये है कि इसकी कहानी इधर-उधर नहीं भटकती… न सिर्फ युवाओं नहीं बल्कि फिल्म, फैमिली ऑडिएंस को भी स्क्रीन से चिपकाए रखने में काबयाब होती है.

अगर ऑडिएंस द्वारा इस फिल्म को पूरे दिल से स्वीकार कर लिया जाए तो, ये ‘एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा’ न सिर्फ सिनेमा जगत में बल्कि भारतीय समाज में एक टर्निंग प्वाइंट साबित हो सकती है. जहां पर महिलाओं के समलैंगिक रिश्ते से जुड़ी बातें करना आसान बात नहीं है.

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