Hungama 2 Review: फिल्म बनाने की फैक्ट्री प्रियदर्शन का एक खराब प्रोडक्शन है ‘हंगामा 2’

Hungama 2 Review: हर साल कम से कम दो चार फिल्में देखनी पड़ती हैं, जिनको देखते-देखते ही एहसास हो जाता है कि आज गलत फंस गए हैं. इस साल की फेहरिस्त में निर्देशक प्रियदर्शन की हाल ही में डिज़्नी+ हॉटस्टार पर रिलीज ‘हंगामा 2’ को जोड़ लेना पड़ेगा. मूलतः मलयालम फिल्में बनाने वाले प्रियदर्शन करीब 40 साल से फिल्में बना रहे हैं. उनकी मलयालम फिल्मों के रीमेक अलग अलग भाषाओं में होते रहे हैं जिनमें से अधिकांश वो खुद ही डायरेक्ट करते हैं. इस बार भी उनकी 1994 में रिलीज़ मलयालम फिल्म ‘मीनारम’ का रीमेक बनाया है ‘हंगामा 2’ जो कि एक असफल प्रयास है. प्रियदर्शन की 2003 में रिलीज फिल्म ‘हंगामा’ सीरीज को आगे बढ़ाने का. लगभग 75 से ज़्यादा फिल्म निर्देशित करने वाले प्रियदर्शन की फिल्म फैक्ट्री में से इस बार एक खराब प्रोडक्ट निकल आया है.

शिल्पा शेट्टी कुंद्रा ने 14 साल बाद सिनेमा में एंट्री ली है, उनकी आखिरी फिल्म ‘अपने’ थी लेकिन उनकी त्वचा से उनकी उम्र का सचमुच पता ही नहीं चलता. हंगामा 2 में प्रियदर्शन भी हिंदी फिल्म की तरफ करीब 8 साल बाद लौटे हैं. उन्होंने आखिरी हिंदी फिल्म डायरेक्ट की थी- रंगरेज जो बिलकुल नहीं चली थी. हंगामा 2 का मिज़ाज कॉमेडी और रोमांस के बीच में कहीं पड़ा हुआ मिलता है और दुःख की बात है कि वो इस जगह से आगे ही नहीं हिलता. बहुत समय तक दर्शकों को 2003 वाली अक्षय खन्ना-आफताब शिवदासानी-रिमी सेन-परेश रावल वाली हंगामा के सीक्वल की उम्मीद थी लेकिन ये कहानी बिलकुल अलग है. जितनी आसान हंगामा थी, इस हंगामा 2 की कहानी उतनी ही कॉम्प्लिकेटेड बनाने की भरपूर कोशिश की गयी है.

फिल्म में वाणी (प्रणिता सुभाष) अचानक आकाश (मीज़ान जाफरी) के घर एक छोटे बच्चे के साथ आ धमकती है और आकाश को उस बच्चे का पिता बताती है. आकाश और वाणी साथ पढ़ते थे और दोनों में नजदीकियां थी, हालांकि आकाश सीरियस था और वाणी नहीं. अपने पिता (आशुतोष राणा) के सामने बुरी तरह फंसे आकाश, अपनी मुंहबोली बहन शिल्पा शेट्टी, उनके शक्की पति परेश रावल और होने वाले ससुर मनोज जोशी के चक्रव्यूह से निकल कर अपने आप को निर्दोष साबित करने की कवायद में लगे रहते हैं. बाकी फिल्म कुछ ऐसे सिचुएशंस की कहानी है जो अब फिल्मों में देखने को नहीं मिलते. कई बार तो ऐसा लगता है कि पैकिंग नयी है माल पुराना ही है. कहानी आगे बढ़ती नहीं है, कन्फ्यूजन बढाती रहती है, नए किरदार आते रहते हैं और परिस्थितयों से हंसी लाने की असफल कोशिशों के बाद फिल्म खत्म हो जाती है. हां, फिल्म में अक्षय खन्ना का कैमियो भी है, और प्रियदर्शन ने अक्षय को पहले की फिल्मों में बहुत बढ़िया तरीके से इस्तेमाल किया है, लेकिन अक्षय का रोल व्यर्थ हो गया है.

मीज़ान जाफरी को आइडेंटिटी क्राइसिस होने वाला है. रणबीर कपूर की नक़ल का ठप्पा लग जायेगा जब तक कि वो अपने आप को एक नए रूप में प्रस्तुत नहीं करेंगे. मीज़ान न रणबीर कपूर जैसा अभिनय कर पाए हैं और न ही अपने पिता जावेद जाफरी की तरह नृत्य कला से प्रभावित कर पाए हैं. इस से तो बेहतर वो अपनी डेब्यू फिल्म ‘मलाल’ में लगे थे. शिल्पा शेट्टी को बड़ी दीदी के रोल में देखने के दिन आ गए लेकिन उनसे सेक्सी दिखवाने का मोह संवरण कैसे किया जाए. परेश रावल के साथ उनकी बेमेल जोड़ी के पीछे उनके माँ न बन पाने की स्टोरी लाइन भी डाली गयी है लेकिन वो ‘चुरा के दिल मेरा’ या ‘हंगामा’ गानों पर उत्तेजक नृत्य करने से नहीं चूकती. अभिनय का शिल्पा शेट्टी से कोई लेना देना नहीं है लेकिन उनकी भूमिका कोई एक्ट्रेस भी करती तो क्या ही फर्क़ पड़ता. परेश रावल तकरीबन व्यर्थ हैं सिर्फ पहली हंगामा में उनके रोल का कुछ 5-7 प्रतिशत निभा पाते हैं. पार्ट टाइम वकील और फुल टाइम बीवी पर शक करने वाले रोल में परेश अचानक ही स्नाइपर राइफल से निशाना साधने में लगे हैं.

टीकू तलसानिया, मनोज जोशी, राजपाल यादव, के किरदार ठीक से लिखे ही नहीं गए तो उनके पास करने के लिए कुछ था नहीं. तीनों प्रतिभाशाली हैं और तीनों को ही वेस्ट कर दिया गया है. कॉमेडी के नाम पर टीकू तलसानिया एक बड़े बर्तन में सर फंसा लेते है और परेश रावल उसे निकालते हैं. इमोशंस के नाम पर प्रणिता की छोटी बेटी, घर के दूसरे बच्चों के मज़ाक की वजह से जलते हुए पटाखों से घायल हो जाती है. अगले ही पल डॉक्टर उन्हें “खतरे की कोई बात नहीं” का संदेस देता है और प्रणिता घर के बच्चों का दिल जीत लेती है. फिल्म में मीज़ान के बड़े भाई के रूप में रमन त्रिखा का महामूर्ख किस्म का किरदार भी है. रमन जब जवान थे उनकी टेलीविज़न पर फैन फॉलोइंग थी, अब उनको देख के दया सी आती है. फिल्म में दो चार छोटे किस्से और चलते रहते हैं जिस को मूल कहानी की बिरयानी में धनिया की तरह बिखेर दी गयी है. न कोई स्वाद में इज़ाफ़ा हुआ और न ही उसकी खूबसूरती बढ़ी. फिल्म में आशुतोष राणा की वजह से थोड़ी बात बनती है लेकिन उनका रोल भी ठीक से डिफाइन नहीं किया गया है और अकेले वो फिल्म चलाने के लिए ज़िम्मेदार भी नहीं हैं. फिल्म में प्रणिता सुभाष का रोल ठीक से लिखा नहीं गया है और उनके अधपके अभिनय से भी उनका रोल और अजीब हो जाता है.

फिल्म का संगीत अनु मालिक का है. उनके सबसे ख़राब कामों में से एक है. अनु मालिक के चाहने वाले निराश होंगे. चुरा के दिल मेरा का भी रीमेक किया है जो कि उसके ओरिजिनल वर्शन की हत्या कर के बनाया गया है और 90 के दशक के अक्षय-शिल्पा के दीवानों को रुला रहा है. बाकी संगीत साधारण से भी गया गुज़रा है.

हेरा फेरी, हंगामा, मालामाल वीकली यहां तक की दे दना दन के भी कई फैंस हैं और जो मलयालम फिल्में देखते हैं वो प्रियदर्शन के दीवाने हैं. हंगामा 2 से उन्हें बड़ी उम्मीदें थी. फिल्म ने इतना ज़्यादा निराश किया कि किसी को भी ये फिल्म देखने के लिए कहना, एक नयी दुश्मनी को जन्म देने के बराबर है. इस से बेहतर है कि प्रियदर्शन की कोई पुरानी फिल्म फिर से देख ली जाए.

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