Narappa Review: सफल फिल्म के रीमेक में आत्मा कैसे बरकरार रखें, सीखिए नरप्पा से

आपकी फिल्मोग्राफी में नेशनल अवॉर्ड्स की भरमार हो, फ़िल्म फेयर अवॉर्ड्स हों और सबसे बड़ी बात आपकी एक फिल्म भारत की ओर से ऑस्कर (अकादमी अवॉर्ड) में भेजी जाने वाली फिल्म हो तो आप कोई भी फिल्म बनाएं, उनसे कुछ अलग होने की उम्मीद तो रहती ही है. 2019 में निर्देशक वेट्रीमारन ने अपने प्रिय अभिनेता धनुष के साथ एक तमिल फिल्म बनायीं थी “असुरन (Asuran)”. जातिगत संघर्ष, अमीरी – गरीबी, दलितों पर होने वाले अत्याचार और उनकी ज़मीन छीन लेने की कहानियां, दलित महिलाओं के साथ बलात्कार और ऊंची जाति के लोगों द्वारा दलितों की सामूहिक हत्या जैसे संवेदनशील और खूंखार विषय पर बनी अपने तरह की वो एक अनूठी फिल्म थी. हाल ही में इस फिल्म का तेलुगु रीमेक, अमेज़ॉन प्राइम वीडियो पर रिलीज़ किया गया. नरप्पा (Narappa) को देखते देखते ये एहसास तो होता है कि ये तो असुरन की फ्रेम बाय फ्रेम कॉपी है लेकिन वहीं ये बात बहुत अच्छे से समझने की है कि रीमेक में सारा खेल अभिनय पर निर्भर करता है.

तमिल असुरन के धनुष और तेलुगु नरप्पा के वेंकटेश, दोनों की ही उदासी और हिंसा की सम्मिश्रित आंखें, कमाल काम करती हैं. साहित्य अकादेमी अवार्ड विजेता तमिल लेखक पूमणि के लिखे उपन्यास वेक्कई पर आधारित और मणिमारन और वेट्रीमारन की लिखी पटकथा पर आधारित थी फिल्म असुरन. इसका तेलुगु रीमेक श्रीकांत अडाला ने निर्देशित किया है. नरप्पा (वेंकटेश) अपने परिवार यानि पत्नी सुन्दरम्मा (प्रिया मणि) अपने बेटे सिनप्पा, बेटी बुजिअम्मा और अपने साले बासवैया के साथ रहता है.

ज़मींदारों को नरप्पा के खेतों पर कब्ज़ा करना है ताकि वहां सीमेंट की फैक्ट्री लगाई जा सके. इसके चलते ज़मींदार पाण्डुस्वामी (आदुकालम नरेन्) का बेटा रंगाबाबू (श्रीतेज), नरप्पा की पत्नी सुन्दरम्मा के साथ बदतमीज़ी करता है. नरप्पा का बड़ा बेटा मुनिकन्ना (कार्तिक रत्नम) रंगबाबू की पिटाई कर देता है और पुलिस के हाथों गिरफ्तार हो जाता है जिसके बाद पाण्डुस्वामी के गुंडे उसकी गला काट कर हत्या कर देते हैं. साल भर बाद नरप्पा का छोटा बेटा सिनप्पा इस बात का बदला लेना चाहता है और वो पाण्डुस्वामी की हत्या कर देता है.

नरप्पा और सिनप्पा जंगल और नदी के रास्ते से भाग निकलते हैं. बचा हुआ परिवार अलग अलग जगह छिपता फिरता है. नरप्पा, अपने बेटे को रंगाबाबू के गुंडों के हमले से बचाता है और फिर वो अपने बेटे को अपने खूंखार अतीत की कहानी सुनाता है. गरीबी और जाति द्वेष से मलिन ज़िन्दगी में कैसे नरप्पा के पूरे परिवार को गुंडों ने ज़िंदा जला दिया और कैसे नरप्पा ने उन सभी गुंडों को मार डाला. एक शांत जीवन की तलाश में भटकते नरप्पा को बासवैया और उसकी बहन सुन्दरम्मा मिलते हैं और वो फिर अपनी नयी ज़िन्दगी बसने की कोशिश करता है. हिंसा से परेशान नरप्पा हर विवाद से दूर रहना पसंद करता है. सिनप्पा की अपने पिता को लेकर राय बदल जाती है. फिर एक वरिष्ठ वकील और सलाहकार की मदद से नरप्पा कोर्ट में सरेंडर करने के लिए मान जाता है. मामले को ख़त्म करने के लिए नरप्पा अपनी ज़मीन भी बेचने को तैयार हो जाता है लेकिन तब तक कोर्ट के आदेश का उल्लंघन कर के रंगबाबू और दोराईस्वामी चाल चलते हैं, सिनप्पा का अपहरण कर उसके साथ मार पीट करते हैं. नरप्पा गुस्से में आ कर सभी को मार डालता है और फिर परिवार वालों की सलाह पर समर्पण कर कोर्ट चला जाता है.

कहानी बदले की कथा जैसी नज़र आती है लेकिन ये बदला वर्षों के जातीय संघर्ष के परिणाम स्वरुप सामने आता है. देसी शराब बनाने वाले को उसी के समाज में शादी के लिए लड़की नहीं मिलती तो वो अपनी रिश्तेदार ( बड़ी बहन की बेटी यानि उसकी भांजी) से शादी करने के लिए हां कर देता है. नरप्पा का बड़ा भाई और एक समाज सेवी वकील, ज़मींदारों द्वारा अवैध रूप से कब्जे जमीन को उनके असली मालिकों को दिलवाना चाहते है, जिसका संघर्ष फिल्म के मूल में दिखाया गया है. नरप्पा अपना पहला परिवार हिंसा की वजह से खो देता है और दूसरी बार वो एक ऐसी लड़की से शादी करता है जिसकी शादी नहीं हो पा रही है. अपने बेटे को पुलिस के चंगुल से छुड़ाने के लिए नरप्पा जब पूरे गांव में घर घर जा कर उच्च समाज के लोगों के सामने नाक रगड़ कर माफ़ी मानता है तो ये उसकी मजबूरी नहीं है बल्कि वो हिंसा के घातक परिणाम से वाकिफ है. अपने पूरे परिवार को एक बार खो चुका नरप्पा, अपने बड़े बेटे को फिर से खो देता है और इन सबके बावजूद उसका छोटा बेटा उसे डरपोक समझता है, तो अहिंसा का बापू का पथ हमें याद आता है. फिल्म के अंत में वो अपने बेटे को एक ही सीख देता है कि उसे पढ़ना लिखना है और एक ढंग की नौकरी करनी है क्योंकि ज़मीन और पैसे की तरह ज़मींदार उस से उसकी पढाई नहीं छीन पाएंगे.

नरप्पा के किरदार में वेंकटेश ने ज़बरदस्त अभिनय किया है. वेंकटेश अनुभवी हैं. वो धनुष जैसी निरीह आंखें तो नहीं रखते लेकिन उनका गेट अप इतना बढ़िया किया गया है कि चेहरे पर उम्र और उम्र के थपेड़े साफ़ नज़र आते हैं. लड़ाई, हिंसा और हथियार से उनकी विरक्ति साफ़ झलकती है. उनका मन लड़ने का नहीं होता है लेकिन वर्षों से जो अन्याय झेलते आ रहा हो, जब वो फटता है तो भूचाल आ जाता है. फिल्म पूरी वेंकटेश की है लेकिन प्रिया मणि की भूमिका की तारीफ करनी होगी. अंदर से रोज़ाना तिल तिल कर जलते हुए अपने पति को देख कर वो थोड़ी तल्ख़ हो जाती है. अपने बेटे को खो बैठती है. अपनी बेटी के साथ अलग अलग जगह छुपती है. लेकिन उसके अंदर की आग पूरी फिल्म में जलती रहती है. उसके तेवर वेंकटेश के किरदार से भारी हैं. बाकी अभिनेताओं के किरदार कम हैं, लेकिन उन्होंने भूमिकाएं बहुत अच्छी से निभाई हैं.

निर्देशक श्रीकांत अडाला को कुछ खास करना नहीं था, लेकिन उनकी माध्यम पर पकड़ साफ़ नज़र आती है. किसी भी क्षण आप इस फिल्म को असुरन से जोड़ भी सकते हैं और अलग से भी देख सकते हैं. कहने को तेलुगु रीमेक है लेकिन इस फिल्म में असली कहानी और फिल्म की आत्मा के साथ कोई खिलवाड़ नहीं किया गया है. इसलिए असुरन को देख कर मन जितना दुखी हुआ था नरप्पा ने भी उन्हीं भावनाओं को जन्म दिया. जिहोने असुरन नहीं देखी या देखी भी हो, तब भी ये फिल्म उनको झकझोर कर रख देगी. नरप्पा ज़रूर देखिये. एक रीमेक कैसे बनाया जाना चाहिए उसका अंदाजा लग जाएगा और ये एक बेहतरीन फिल्म तो है ही.

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