Ray Review: जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी

Ray Review: रामायण की चौपाई का अंश है- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। इसका अर्थ बड़ा ही गूढ़ है और मनप्रिय भी. प्रभु को जिसने जैसा सोचा, प्रभु वैसे ही नजर आये. शबरी के राम अलग थे तो लक्ष्मण के बड़े भाई राम अलग. रावण का अंत करने वाले योद्धा राम अलग थे तो दशरथ पुत्र राम अलग. जिसने जिस रूप में प्रभु को देखा, वो वैसे ही नजर आये. रे की कहानियों का मिजाज भी कुछ ऐसा ही है. हर पढ़ने वाला उसमें अपनी सोच के हिसाब से अर्थ निकाल सकता है. सत्यजीत रे जैसे कथाकार और फिल्मकार की कहानियों पर जब नए फिल्मकार अपने नज़रिये से नए अंदाज और परिवेश में बसी फिल्में बनाते हैं तो इस साहसिक कार्य के लिए हमें इन फिल्मकारों की सोच और क्षमता को अलग ढंग से देखना जरूरी है. सिर्फ फिल्म की समीक्षा कर देने से कर्तव्यों की इतिश्री नहीं हो सकती.

नेटफ्लिक्स पर सत्यजीत रे की लिखी हुई कहानियों पर प्रतिभावान फिल्मकार श्रीजीत मुखर्जी, अभिषेक चौबे और वासन बाला ने एक एंथोलॉजी रची है, जिसमें रे की चार कहानियों को उन्होंने अपने नजरिये से फिल्माया है और दर्शकों के लिए रे की कहानियों की एक नयी प्रस्तुति दी है. सत्यजीत रे के भारतीय और विश्व सिनेमा में योगदान पर कुछ लिखना घातक हो सकता है. एक तो रे के चाहनेवालों की कोई कमी नहीं है दूसरा, जिस समय में सत्यजीत रे ने इन मनोवैज्ञानिक कथाओं को लिखा था, उनकी लेखनी की विशेषता थी कि उनकी अधिकांश कहानियां वर्षों बाद भी कोई भी अपने ढंग से पढ़ सकता था. नेटफ्लिक्स पर हाल ही में रिलीज एंथोलॉजी ‘रे’ में यही हुआ है. रे यानी सत्यजीत रे की कहानियों का अपने नजरिये से प्रस्तुतिकरण का एक अनूठ प्रयास है.

रे में 4 कहानियां चुनी गयी हैं. पहली कहानी है ‘बिपिन चौधुरीर स्मृतिभ्रम’. इस कहानी पर सत्यजीत रे के सुपुत्र संदीप रे, 2012 में फिल्म बना चुके हैं. इस बार निर्देशन की जिम्मेदारी संभाली है श्रीजीत मुख़र्जी ने. श्रीजीत ने अपनी पहली ही फिल्म ऑटोग्राफ से अपनी प्रतिभा का परिचय दे दिया था. उनकी तीन बंगाली फिल्मों जातीश्वर, चोतुष्कोण और गुमनामी ने कई कैटेगरी में राष्ट्रीय फिल्म अवॉर्ड जीते हैं. इसके पहले श्रीजीत ने अपनी एक बंगाली फिल्म राजकहिनी का हिंदी में पुनर्निर्माण किया था, विद्या बालन अभिनीत बेगम जान. सत्यजीत रे के ही मशहूर किरदार जासूस फेलू दा को लेकर उन्होंने 6 एपिसोड की एक बंगाली वेब सीरीज ‘फेलूदा फेरोत’ भी बनायीं थी और जल्द ही इसका सीजन 2 भी आने वाला है.

‘बिपिन चौधुरीर स्मृतिभ्रम’ कहानी का नाम इस वेब सीरीज में ‘फॉरगेट मी नॉट’ हो गया है. मुख्य पात्र हैं अली फजल और श्वेता बासु प्रसाद. मूल कहानी एक किताब की दुकान में बसाई गयी थी जो निर्देशक श्रीजीत और लेखक सिराज अहमद ने एक कॉर्पोरेट दुनिया में परिवर्तित कर दी है. कहानी एक तेज दिमाग शख्स की है जिसकी याददाश्त कंप्यूटर से भी तेज है लेकिन वो अपनी तरक्की में इस कदर गाफिल है कि वो अपने आस पास के लोगों की, अपने बिजनेस के साथियों की, अपनी पत्नी, अपने मित्र और यहां तक कि अपनी सेक्रेटरी की भावनाओं को भी अपनी महत्वकांक्षा की बली चढ़ा देता है. शीर्ष पर बैठे इस शख्स की याददाश्त जब खो जाती है तो उसकी जिन्दगी की बखिया उधड़ जाती है. इस कहानी में रे ने एक ऐ सफल शख्स की कल्पना की थी जो स्वकेन्द्रित है और दूसरों को आहत करने की अपनी आदत से पूरी तरह अनजान है. आज कई दशकों बाद इस तरह के लोग हमें बहुतायत से कॉर्पोरेट दुनिया में नज़र आते हैं. रे की कथा की कोई उम्र नहीं है लेकिन पटकथा थोड़ी उलझी सी है. कहानी में स्मृतिभ्रम की गुत्थी जिस तरह से सुलझती है, तो ऐसा लगता है कि यहां थोड़ा अतिरेक वाला मामला है. क्रूर अंत की आवश्यकता नहीं थी शायद. अली फजल ने फुकरे के बाद पहली बार ढंग का काम किया है. हालांकि गालियां देते ठीक नहीं लगते मगर उनका पद उनकी भावनाओं पर भारी है. श्वेता बासु प्रसाद का रोल छोटा है लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण है. अन्य कलाकार ज़रुरत के मुताबिक हैं. नेटफ्लिक्स की वेब सीरीज सेक्रेड गेम्स के सिनेमेटोग्राफर स्वप्निल सोनवणे ने इस कहानी में जान डाल दी है. कुछ दृश्य, खासकर जब अली फज़ल अपनी यादों से जूझ रहे होते हैं, वो कमाल के बने हैं.

श्रीजीत ने ही दूसरी कहानी ‘बहरूपिया’ भी निर्देशित की है. रे की इस कहानी में पहचान के लिए तरसते इंसान के हाथ एक जादुई शक्ति जैसा हथियार लग जाने पर वो किस किस तरह के किरदारों के पीछे छुप कर, अपने लिए एक सशक्त पहचान ढूंढता है, इस मार्मिक मनोवैज्ञानिक चित्रण है. इस रोल के लिए के के मेनन से बढ़िया कोई और दार्शनिक अभिनेता हो ही नहीं सकता था. अपनी दादी से विरासत में मिले 75 लाख रुपये और रूप-रंग बदलने की किताब के ज़रिये एक अति सामान्य शख्स हर दिन एक नए रूप में लोगों से मिलता है. अपने कमज़ोर व्यक्तित्व को दबा कर, कुछ और बन कर सामने आता है और दिल में छिपी कर कुंठा को एक अलग अंदाज़ में ज़ाहिर करता है. चरित्र में थोड़े से परिवर्तन से हम किसी भी घोंचू को आसमान पर बिठा देते हैं. एक प्रोजेक्टेड आइडेंटिटी की वजह से हम किसी भी शख्स को सर्वश्रेष्ठ समझने लगते हैं. ये ऐसा तंज है आज के समाज पर जहाँ सोशल मीडिया सेलिब्रिटीज का निजी जीवन में संघर्ष शून्य के बराबर है लेकिन आभासी दुनिया में उनकी पहचान किसी बड़ी शख्सियत से कुछ कम नहीं है. इस कहानी को थोड़ा ध्यान से देखना पड़ता है और जो बात छुपी है वो ढूंढनी पड़ती है. इसको देखने में शायद दर्शकों को उतना मज़ा नहीं आएगा क्योंकि परिवेश थोड़ा अलग है.

तीसरी कहानी है अभिषेक चौबे द्वारा निर्देशित ‘हंगामा है क्यों बरपा’, जिसमें हैं मनोज बाजपेयी और गिरिराज राव. अभिषेक ने इसके पहले इश्क़िया और डेढ़ इश्क़िया जैसी उर्दू कहानियों में मुस्लिम परिवेश का सुन्दर चित्रण प्रस्तुत किया है. इस कहानी में मनोज बाजपेयी के चरित्र ने अभिनय की जितनी छटाएं बिखेरी हैं, वो आम तौर पर किसी भी फिल्म में देखने को नहीं मिलती. मनोज को ये किरदार करते समय थिएटर के दिनों की थोड़ी ओवर द टॉप एक्टिंग करने का मौका मिला है. उनके साथ हैं गजराज राव, जो कि अभिनय के गिरगिट हैं. एक नया किरदार और एक नए गजराज राव से मिलते रहते हैं हम. सत्यजीत रे की कहानी “बारिन भौमिकेर ब्याराम” पर आधारित इस कहानी में मनोज क्लेप्टोमेनिया से जितनी सहजता से एक शायर बनने का उपक्रम करते हैं, वो दर्शकों को मज़ा दे जाता है. पूरे गेटअप में मनोज ने जो नाज़ुक ख़याली को ज़िंदा किया है, उसकी अदा आने वाले समय में दर्शकों को याद रह जाएगी. यह इस एंथोलॉजी की सबसे मज़बूत कहानी है और अभिषेक चौबे ने इसे बहुत अनूठे तरीके से प्रस्तुत भी किया है. गुजरती सुपरहिट फिल्मों के लेखक निरेन भट्ट, जिनको हिंदी दर्शक प्रसिद्ध टीवी सीरियल तारक मेहता का उल्टा चश्मा के लेखक के तौर पर जानते हैं, ने रे की कहानी को शायरी का अनूठा रंग दिया है. अकबर इलाहाबादी की ग़ज़ल से कहानी का नाम लिया है और ग़ज़ल के मिसरों को याद करें तो कहानी भी ग़ज़ल की ही तरह नशीली लगती है. कहानी में उर्दू जुबां के मिले जुले डायलॉग हैं जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर देते हैं क्योंकि रे की कहानी की ही तरह इसमें फलसफा बड़ी ही खूबसूरती से मिलाया गया है.

चौथी कहानी सबसे कमज़ोर मानी जा रही है, और यहां आकर निर्देशक चूक गए हैं ऐसा लोगों का मानना है लेकिन ये धारणा थोड़ी गलत है. निर्देशक वासन बाला ने रे की कहानी ‘स्पॉटलाइट” को वर्तमान समय में सेट किया, उनके चहीते अभिनेता हर्षवर्धन कपूर को लिया और उनके साथ चन्दन रॉय सान्याल और राधिका मदान जैसे और प्रतिभाशाली लोगों को कहानी में जोड़ दिया. सत्यजीत रे ने अपने समय में देश के सबसे प्रतिभाशाली अभिनेताओं के साथ काम किया है. कुछ कलाकार तो रे की फिल्म में काम करने का ख्वाब ही देखते रहे. लोगों के मनोविज्ञान के अध्ययन की रे की आदत की वजह से वो एक किरदार में कई किरदार छुपा पाते हैं. हर्षवर्धन प्रतिभाशाली हैं. उन्हें सही रोल्स की दरकार है और वो उन्हें मिले हैं. अनुराग कश्यप की नेटफ्लिक्स फिल्म “एके वि. एके” में उन्होंने अनिल कपूर के बेटे की भूमिका में कमाल काम किया था. अब रे की कहानी “स्पॉटलाइट” में एक ऐसे फ़िल्मी हीरो की भूमिका में है जो फ़िल्मी सितारों की ही तरह ईगो भरी दुनिया में रहता है. उनके मित्र और मैनेजर चन्दन रॉय सान्याल उन्हें धरातल पर लाते रहते हैं. राधे माँ जैसे एक किरदार में राधिका मदान ने रे के फलसफे को बड़े ही मज़ाकिया अंदाज़ में प्रस्तुत किया है. हर हीरो की एक पहचान होती है, कोई सिग्नेचर स्टाइल होती है. हर्षवर्धन के करैक्टर की पहचान है उनका “एक लुक” जो उन्हें लगता है कि धीरे धीरे कम असरदार हो रहा है. फ़िल्मी सितारों की कमज़ोरी, उनकी असुरक्षा और खुद को आका समझने की आदत का बहुत प्यारा चित्रण है. इसे देखने के लिए थोड़ा पेशेंस होना चाहिए. और हर्षवर्धन एक स्टार पुत्र हैं, ये भी भूलना पड़ता है. फिल्म में छोटी छोटी बातें हैं जो देखने वाले को कटाक्ष के तौर पर नज़र आती है.

4 में से 3 कहानियों में महिला पात्र बहुत सशक्त हैं और कहानी को नए आयाम उन्हीं की वजह से मिलते हैं. इन किरदारों को ध्यान से देखें तो फिल्म के पुरुष पात्र इनके सामने फीके नज़र आएंगे क्योंकि फिल्म में जो ड्रामा है उसकी परिणीति उन्ही किरदारों की वजह से आती है. रे की ये ये एंथोलॉजी एक कठिन प्रयोग है. बंगाल में जिन्हें भद्रलोक कहा जाता है वो शायद इन फिल्मों से नफरत करें क्योंकि वो रे की कहानियों को उनके मूल स्वरुप में ही देखना चाहते हैं. उन्हें उम्मीद होती है की रे की कहानियां उनके सुपुत्र संदीप रे ही निर्देशित करें. लेकिन श्रीजीत, अभिषेक और वासन ने ये बहुत बड़ा ज़िम्मा उठाया है और एक हद तक सफल भी हुए हैं. कहानी कहने की पद्धति में नवीनता है और रे की कहानियां इसी वजह से कालजयी कही जाती हैं.

इस प्रयोग को देखना चाहिए. किसी तरह के पूर्वाग्रह को छोड़ के देखना चाहिए. गंभीरता से देखना चाहिए क्योंकि तभी रे की कहानियों का मर्म समझ आएगा. और निर्देशकों द्वारा उन्हें किस तरीके से एडाप्ट किया है वो समझ आएगा. हर कहानी करीब 1 घंटे की है तो आपको तकरीबन 4 घंटे खर्चा करना होंगे. आप एक एक कर के भी देख सकते हैं ताकि हर कहानी अपना प्रभाव ठीक से डाल सके. रे की मूरत नए निर्देशकों को कैसी नजर आयी, इसके लिए रे की कहानियों पर किया ये प्रयोग, अद्भुत है.

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